Tuesday, 1 October 2019

Bouddh Dhamm - jharkhand

      बौद्ध धर्म का झारखण्ड क्षेत्र से गहरा संबंध है। डॉ वीरोत्तम ने अपनी रचना ' झारखण्ड :इतिहास एवं संस्कृति ' में गौतम बुद्ध की जन्म भूमि झारखण्ड को बताया है ,जिसे तथ्य नकारते है। इसका प्रमाण पलामू के मुर्तिया गांव से प्राप्त सिंह मस्तक है। यह अवशेष वर्तमान में रांची विश्वविद्यालय संग्रहालय में सुरक्षित है तथा साँची में स्थित बौद्ध स्तूप पर उत्कीर्ण सिंह मस्तिष्क से काफी समानता रखता है। धनबाद जिले में करुआ ग्राम का बौद्ध स्तूप ,स्वर्णरेखा नदी के तट पर डालमी एवं कंसाई नदी के तट पर बुद्धपुर में बौद्ध धर्म से सम्बंधित अनेक अवशेष पाए गए है।
     


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झारखण्ड और पश्चिम बंगाल के सीमा क्षेत्रों पर लाथोंटोंगरी पहाड़ी में बेंग्लर ने चैत्य तथा पकबिरा में आर सी बोकन ने बौद्ध खंडहर की खोज की है। चैत्य बौद्ध धर्म का पवित्र पूजा स्थल होता है। 1919 ई में ए शास्त्री ने बाग में काले चिकने पत्थर की बुद्ध मूर्ति की खोज की थी, जिसकी दोनों भुजायँ टूटी हुई है। 
            खूंटी जिले के वेलवादाग ग्राम से बौद्ध विहार का अवशेष प्राप्त हुआ है। यहां से प्राप्त ईंट साँची के स्तूप में प्रयुक्त ईंट एवं मौर्यकालीन ईंटों के समान है। गुमला जिले के कटूंगा गांव ,पूर्वी सिंघभूम के भुला ग्राम से बुद्ध की प्रतिमा तथा पूर्वी सिंहभूम के ईचागढ़ से स्कूल के दीवार से महासिरि तारा की एक प्रतिमा प्राप्त हुई है ,1984 से यह प्रतिमा रांची संग्रहालय में सुरक्षित है। राजमहल क्षेत्र स्थित कांकजोल से बुद्ध की मूर्ति की खोज कनिंघम द्वारा की गई है। छात्र जिले के ईटखोरी में भद्रकाली मंदिर परिसर से बुद्ध की चार प्रतिमायें प्राप्त हुई है। ये प्रतिमाएं सातवीं सदी की है। तथा विभिन्न मुद्राओ में है। ये मूर्तियां बालू पत्थर की है, जो हर्षवर्द्धन कालीन प्रतीत होती है। गौतम बुद्ध बोधगया में ज्ञान प्राप्ति (बोधत्व ) के बाद 45 वर्षों तक जिन क्षेत्रों में ज्ञान का उपदेश देते रहे उनमे झारखण्ड क्षेत्र भी शामिल था। 
             कुषाण वंश के सर्वश्रेष्ठ शासक कनिष्क के सिक्के रांची के आसपास के क्षेत्र से प्राप्त हुआ है। महायान बौद्धधर्म को प्रश्रय देने वाले शासक कनिष्क ने लगभग सम्पूर्ण बिहार - झारखण्ड क्षेत्र पर शासन स्थापित कर लिया था। इस तरह कनिष्क के समय तक झारखण्ड क्षेत्र में बौद्धधर्म फल - फूल रहा था ,जब गुप्त वंश के समय विशेषकर समुद्रकाल के काल में वैष्णव धर्म का उद्धभव एवं प्रभाव इस क्षेत्र में पड़ने लगा तब बौद्ध धर्म का प्रभाव शिथिल होने लगा। गुप्त वंश के पतन के बाद जब इस क्षेत्र पर कट्टर शैव शासक बंगाल के शशांक का शासन स्थापित हुआ तब उसने कई बौद्ध स्थलों को नष्ट कर दिया। 
      पुना बौद्ध धर्म के संरक्षक शासकों हर्षवर्धन एवं पाल वंश के समय झारखण्ड क्षेत्र पर बौद्ध धर्म के प्रभाव में वृद्धि हुई। 

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